नए लेबर कोड्स का असर: घटेगी इन-हैंड सैलरी, लेकिन रिटायरमेंट फंड होगा ज्यादा मजबूत
- bySagar
- 26 Jan, 2026
देश में लागू किए गए नए लेबर कोड्स को लेकर सैलरीड कर्मचारियों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन नए नियमों से हर महीने बैंक अकाउंट में आने वाली सैलरी कम हो जाएगी और टैक्स बढ़ जाएगा? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इसका जवाब हां है—लेकिन इसके फायदे लंबी अवधि में नजर आएंगे।
सरकार ने 29 पुराने श्रम कानूनों की जगह चार नए लेबर कोड्स लागू किए हैं। इनका मकसद कानूनों को सरल बनाना, कर्मचारियों की सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना और वेतन संरचना को पारदर्शी बनाना है।
सैलरी स्ट्रक्चर में सबसे बड़ा बदलाव क्या है?
नए लेबर कोड्स के तहत यह अनिवार्य किया गया है कि किसी भी कर्मचारी की बेसिक सैलरी उसकी कुल CTC का कम से कम 50% होनी चाहिए।
अभी ज्यादातर कंपनियां बेसिक सैलरी को 30–35% तक सीमित रखती हैं और बाकी रकम HRA, स्पेशल अलाउंस और अन्य भत्तों के रूप में देती हैं। इससे डिडक्शन कम रहता है और इन-हैंड सैलरी ज्यादा मिलती है।
क्यों घट सकती है हर महीने मिलने वाली सैलरी?
कई जरूरी बेनेफिट्स बेसिक सैलरी से जुड़े होते हैं, जैसे:
- प्रोविडेंट फंड (PF) – बेसिक का 12%
- ग्रेच्युटी – बेसिक सैलरी पर आधारित
- लीव इनकैशमेंट – बेसिक से जुड़ा
बेसिक सैलरी बढ़ने से इन सभी मदों में कटौती बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर यह होगा कि हर महीने खाते में आने वाली सैलरी पहले से कम हो जाएगी।
PF और ग्रेच्युटी बढ़ना क्यों फायदेमंद है?
हालांकि इन-हैंड सैलरी घटेगी, लेकिन कर्मचारियों का रिटायरमेंट फंड मजबूत होगा। PF में ज्यादा योगदान से रिटायरमेंट पर बड़ा कॉर्पस मिलेगा और ग्रेच्युटी की रकम भी बढ़ेगी।
यानि आज थोड़ी कम सैलरी, लेकिन भविष्य में ज्यादा आर्थिक सुरक्षा।
टैक्स पर क्या पड़ेगा असर?
नए नियमों के तहत जब बेसिक सैलरी बढ़ेगी, तो अलाउंस का हिस्सा घट जाएगा। चूंकि कई अलाउंस टैक्स फ्री या कम टैक्स वाले होते हैं, इसलिए:
- टैक्सेबल इनकम बढ़ सकती है
- मासिक टैक्स डिडक्शन ज्यादा हो सकता है
- नेट सैलरी पर असर पड़ेगा
कर्मचारियों को क्या करना चाहिए?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि कर्मचारी घबराने के बजाय:
- अपनी सैलरी स्लिप और स्ट्रक्चर को समझें
- टैक्स प्लानिंग पर ध्यान दें
- लॉन्ग-टर्म फाइनेंशियल फायदे को ध्यान में रखें
नए लेबर कोड्स से सैलरी की संरचना में बड़ा बदलाव आएगा। भले ही इन-हैंड सैलरी थोड़ी कम हो और टैक्स बढ़े, लेकिन बदले में कर्मचारियों को बेहतर रिटायरमेंट बेनेफिट्स और मजबूत सोशल सिक्योरिटी मिलेगी।




